(News) शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति का संबोधन

शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति का संबोधन

1. शिक्षक दिवस के अवसर पर यहां उपस्थित होकर आप सबको संबोधित करना मेरे लिए वास्तव में एक खुशी का मौका है। इस अवसर पर आप सबके बीच आकर मैं खुशी का अनुभव करता हूं। इस मौके पर हम देश में शिक्षक समुदाय के समर्पण को मान्यता देते हैं। इस दिन हम स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाले शिक्षकों को राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं। मैं अपने देश के सभी शिक्षकों को बधाई देता हूं और आपकी सेवा और समर्पण के लिए अपने राष्ट्र की ओर से सामूहिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। शिक्षा के विस्तार के लिए निजी और गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों के लिए मैं इस अवसर पर उनकी सराहना करता हूं। भारत की जनता आधुनिक भारत के निर्माण में आपके योगदान को महत्वपूर्ण मानती है।

2. हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रुप में मनाना बहुत ही उचित है। आधुनिक भारत के महानतम दार्शनिकों में से एक इस उज्ज्वल व्यक्तित्व के प्रति यह हमारे राष्ट्र की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है। डॉ राधाकृष्णन आधुनिक भारत की शैक्षिक प्राथमिकताओं के निर्धारक शिक्षाविदों के मार्गदर्शक थे। उनके विचारों को मैं उद्धृत करता हूं : "शिक्षा का लक्ष्य सूचना प्राप्त करना नहीं है, हालांकि यह महत्वपूर्ण है, अथवा तकनीकी कौशल प्राप्त करना नहीं है, हालांकि यह आधुनिक भारत के लिए अनिवार्य है, किन्तु इस प्रकार की सोच, वैसे तर्क वाली मनोवृति, लोकतंत्र की वैसी भावना का विकास करना है, जो हमें जवाबदेह नागरिक बनाता है"। ये प्रेरणादायक शब्द शिक्षा के प्रति उनकी पहुंच का मर्म है। यह आज भी हमें बदलते समय के दौर में निरंतर आत्ममंथन और शिक्षण की विषय-सामग्री और प्रक्रिया को फिर से व्यवस्थित करने के लिए प्रेरित करता है। हमारे बच्चों को आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाने और उन्हें जवाबदेह भारतीय बनाने के प्राथमिक लक्ष्य की दिशा में हमें हमेशा प्रेरित रहना चाहिये।

3. देवियो और सज्जनो, एक ठोस शिक्षा प्रणाली एक जागरुक समाज का ठोस आधार है। यह ऐसी ठोस चट्टान है जिस पर एक प्रगतिशील और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण होता है और जहां कानून का शासन कायम होता है, जहां अपने अधिकारों की तरह ही दूसरों के अधिकारों का सम्मान किया जाता है। एक अच्छी शिक्षा के बल पर विभिन्न विचारधाराओं और मतों के प्रति सहनशीलता की आदत विकसित होती है। एक अच्छी शिक्षा हमें भावनात्मक तौर पर शांति प्रदान करती है। यह हमें अपने शिक्षण का इस्तेमाल स्वस्थ संवाद में शामिल होने के लिए प्रेरित करती है न कि उनके साथ विवाद में शामिल होने में जो हमारे साथ असहमत होते हैं। एक अच्छी शिक्षा हमें मानव मात्र की भलाई के लिए प्रेरित करती है न कि इसके विरुद्ध काम करने के लिए। एक समाज को तभी उन्नत कहा जा सकता है यदि इसके लोगों ने समझदारी और भाईचारा की इच्छा के साथ समस्याओं का समाधान करना सीखा हो।

4. जबसे हमें आजादी मिली है हमने भारत में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभिनव खोज, आर्थिक विकास के क्षेत्र में काफी उन्नति की है। इसके वावजूद भी हमें ऐसा लगता है कि हम एक सचमुच विकसित समाज के रुप में विकसित होने का दावा नहीं कर सकते। विकास केवल कारखानों,बांधों और सड़कों से ही संबंधित नहीं है। मेरे विचार से यह लोगों, उनके मूल्यों और उनकी आस्था तथा सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनकी विश्वसनीयता से संबंधित है। हम आगे की ओर बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में एक ठोस शिक्षा व्यवस्था हमारे मूल्यों को आकार देने में अपने उल्लेखनीय भूमिका निभा सकती है। यहां, हम नैतिक मानकों की पुनर्स्थापना में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका देखते हैं। शिक्षकों को हमारे युवाओं को मातृभूमि के प्रति प्रेम, कर्तव्य-निर्वाह, सबके लिए दया, बहुलवाद के लिए सहनशीलता, महिलाओं के लिए आदर, जीवन में ईमानदारी, आचार में आत्मसंयम, क्रियाकलाप में उत्तरदायित्व और अनुशासन जैसे अनिवार्य सभ्यतामूलक मूल्यों को ग्रहण करने में मदद करनी होगी।

5. एक समय था जब हमारे पास शिक्षा प्राप्ति के लिए तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, सोमापुरा, और उदांतपुरी जैसे विख्यात केंद्र मौजूद थे। इन केंद्रों ने दूर दूर से विद्वानों को व्यापक तौर पर आकर्षित किये। जिन सशक्त दिग्गजों ने ऐसे विश्वविद्यालयों में हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली के लिए विशिष्ट स्थिति का सृजन किया। हमें हमारे नेतृत्व वाले स्थान को फिर से प्राप्त करना है। हम मार्गदर्शन के लिए शिक्षकों की ओर देख रहे हैं।

6. मुझे भरोसा है कि पूरा अध्‍यापक समुदाय अच्‍छी तरह जानता है कि पाठ्यक्रम को दुरूस्‍त करने और सीखने तथा सिखाने के लिए प्रासंगिक एवं प्रभावशाली मौजूदा तरीकों को अपनाने की आवश्‍यकता है। हमें बेहतर शिक्षा और अपने शिक्षा प्रयासों के परिणामों का लगातार विश्‍लेषण किए जाने के लिए प्रणाली विकसित करने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में समुदाय और अभिभावकों की भागीदारी जरूरी होगी ताकि हितधारक इच्छित परिणामों को सुनिश्चित कर सकें। बेहतर दृष्टिकोण विकसित करने के लिए जिज्ञासा बहुत जरूरी होती है। इन सब चीजों से व्‍यक्ति आजाद विचारों वाला, प्रगतिशील और विवेकशील बनता है। 

7. अपने विकासात्‍मक लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने के लिए समावेशी दृष्टिकोण बहुत महत्‍वपूर्ण है। हमें देशभर के अपने बच्‍चों, उनके अभिभावकों और समुदायों का सशक्‍तिकरण करना होगा, ताकि वे अवसरों का उपयोग कर सकें और अपने जीवन को बदलने की क्षमता पैदा कर सकें। पुरुषों और महिलाओं के बीच व्‍याप्‍त साक्षरता के अंतराल को कम करना प्रमुख उद्देश्‍य है। इससे अधिक दुख की बात और कोई नहीं है कि बालिकाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता है। मैं इस अवसर पर यह नीति-वाक्‍य दोहराता हूं, ‘सब ज्ञान के लिए और सबके लिए ज्ञान।’

8. हम जानते हैं कि छात्र अपने अध्‍यापकों को आदर्श व्‍यक्ति के रूप में देखते हैं। भारत में हमें वह पवित्र विरासत मिली है, जिसमें हमारे गुरुओं, संतों और मुनियों ने हमारे मस्तिष्‍क और मेधा को उर्वर बनाने के लिए निस्‍वार्थ प्रयास किया है। प्राचीलकाल में ज्ञान सटीक तरीके से, मेहनत के साथ और विश्‍वास एवं सम्‍मान के वातावरण में प्रदान किया जाता था। हमारे मन-मस्तिष्‍क में यह विश्‍वास पूरी तरह स्थित है कि हमारे माता-पिता हमें जीवन प्रदान करते हैं, हमारे ‘गुरुजन’ हमारे चरित्र और आकांक्षाओं को आकार देते हैं।

9. यूनानी लेखक और दार्शनिक निकॉस कजांत-जा‍किस का उद्धरण दे रहा हूं, ‘वे ही सच्‍चे शिक्षक हैं जो स्‍वयं को सेतु के रूप में प्रस्‍तुत करते हैं और अपने शिष्‍यों को उसे पार करने के लिए आमंत्रित करते हैं। जब शिष्‍य उस सेतु को पार करते हैं तो शिक्षक प्रसन्‍नता से हट जाते हैं और उन्‍हें अपने स्‍वयं के सेतु निर्मित करने की प्रेरणा देते हैं।’ हमारे शैक्षिक संस्‍थानों में ऐसे शिक्षक हैं जो युवा मस्तिष्‍कों के विचारों को आकार देने में सक्षम हैं। अपने शब्‍दों, कार्यों और व्‍यवहार से ऐसे शिक्षक छात्रों को ऐसी प्रेरणा देते हैं कि वे उच्‍चस्‍तर के विचारों को अपना सकें और ऊपर उठ सकें। ऐसे शिक्षक अपने छात्रों में आदर्श मूल्‍यों का निरूपण करते हैं। इस तरह के प्रेरणास्‍पद अध्‍यापकों का प्रोत्‍साहन किया जाना चाहिए ताकि वे अपने ज्ञान, मेधा और दर्शन को बड़े छात्र समुदाय तक पहुंचा सकें।

10. इन शब्‍दों के साथ मैं एक बार फिर शिक्षकों का आह्वान करता हूं कि वे अपने मार्ग पर अडिग रहें और भारत को उसके अगले स्‍वर्ण युग तक ले जाने का नेतृत्‍व करें।

11. मैं आप सबको एक बार फिर धन्‍यवाद देता हूं और आपकी सफलता की कामना करता हूं।

जय हिन्द।

Courtesy : PIB